Monday, June 20, 2011
Wednesday, July 7, 2010
बुलंद इरादों वाली महिला थीं इंदिरा ...
भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री दिवंगत इंदिरा गाँधी अपने दृढ़ इरादों और सटीक फैसलों के लिए जानी जाती थीं। बांग्लादेश के निर्माण में उनकी भूमिका और देश को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने का उनका फैसला कुछ ऐसे कदम थे जिनसे भारत के एक ताकत के रूप में उभरने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
19 नवम्बर 1917 में जन्मीं इंदिरा ने अपने पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके लिए उन्होंने हमउम्र बच्चों को लेकर वानर सेना गठित की थी।
यह वानर सेना जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन करती और झंडे तथा बैनरों के साथ जंग-ए-आजादी के मतवालों का उत्साह बढ़ाती थी। सन 1941 में जब वे आक्सफोर्ड से शिक्षा ग्रहण कर भारत लौटीं तो आजादी के आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गईं।
सितंबर 1943 में अंग्रेज पुलिस ने उन्हें बिना किसी आरोप के गिरफ्तार कर लिया। 243 दिन तक जेल में रखने के बाद 13 मई 1944 को उन्हें रिहा कर दिया गया। इंदिराजी 1959 और 1960 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। 1964 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया गया। ताशकंद समझौते के बाद लालबहादुर शास्त्री का निधन हो गया। इसके बाद प्रधानमंत्री पद की लड़ाई में इंदिरा गाँधी के सामने मोरारजी देसाई आ गए।
कांग्रेस संसदीय दल में हुए शक्ति परीक्षण में उन्होंने 169 के मुकाबले 355 मतों से मोरारजी देसाई को हरा दिया और इस तरह 1966 में वे देश की पाँचवीं तथा पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। जिस समय इंदिराजी ने प्रधानमंत्री पद संभाला उस समय कांग्रेस गुटबाजी की शिकार थी और मोरारजी उन्हें गूंगी गुड़िया कहकर पुकारते थे, लेकिन जल्द ही इस गूंगी गुड़िया ने सबको चौंका दिया।
1967 के चुनावों में कांग्रेस को 60 सीटों का नुकसान हुआ और 545 सीटों वाली लोकसभा में उसे 297 सीटें मिलीं। इस कारण उन्हें मोरारजी को उप प्रधानमंत्री तथा वित्तमंत्री बनाना पड़ा लेकिन 1969 में देसाई के साथ अधिक मतभेदों के चलते कांग्रेस बिखर गई। इंदिरा को समाजवादी दलों का समर्थन लेना पड़ा और अगले दो साल तक उनके समर्थन से ही सरकार चलाई।
पाकिस्तान के साथ 1971 में हुए संग्राम में उन्होंने बांग्लादेश नाम से एक नए देश के गठन में सक्रिय भूमिका निभाई जिससे वे पूरी दुनिया में दृढ़ इरादों वाली महिला के रूप में जानी जाने लगीं और अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें दुर्गा की संज्ञा दी।
अपने साहसिक फैसलों के लिए मशहूर इंदिरा गाँधी ने 1974 में पोखरण में परमाणु विस्फोट कर जहाँ चीन की सैन्य शक्ति को चुनौती दी वहीं अमेरिका जैसे देशों की नाराजगी की कोई परवाह नहीं की।
इन निर्णयों के चलते जहाँ उन्हें देश और दुनिया में बुलंद इरादों वाली महिला के रूप में तारीफ मिली वहीं 1975 में आपातकाल लगा देने के कारण इंदिरा को विश्व बिरादरी की आलोचना का भी सामना करना पड़ा।
आपातकाल लगाने की वजह से 1977 के चुनाव में उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा और वे तीन साल तक विपक्ष में रहीं। 1980 में वे फिर से प्रधानमंत्री बनीं। खालिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसा कठोर कदम उठाया, लेकिन 1984 में उनके ही अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी।
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का कहना है कि इंदिरा गाँधी भारत में बड़े पैमाने पर आतंकवाद भड़कने का अंदाज नहीं लगा पाईं। सिख उग्रवाद 1984 में स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के चलते भड़का।
उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी ने जाने-अनजाने एक ऐसे समय प्रक्रिया शुरू कर दी जब उनकी पार्टी ने भिंडराँवाला जैसे शख्स को अकालियों से लड़ाने के लिए खड़ा किया था। (भाषा)
19 नवम्बर 1917 में जन्मीं इंदिरा ने अपने पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके लिए उन्होंने हमउम्र बच्चों को लेकर वानर सेना गठित की थी।
यह वानर सेना जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन करती और झंडे तथा बैनरों के साथ जंग-ए-आजादी के मतवालों का उत्साह बढ़ाती थी। सन 1941 में जब वे आक्सफोर्ड से शिक्षा ग्रहण कर भारत लौटीं तो आजादी के आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गईं।
सितंबर 1943 में अंग्रेज पुलिस ने उन्हें बिना किसी आरोप के गिरफ्तार कर लिया। 243 दिन तक जेल में रखने के बाद 13 मई 1944 को उन्हें रिहा कर दिया गया। इंदिराजी 1959 और 1960 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। 1964 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया गया। ताशकंद समझौते के बाद लालबहादुर शास्त्री का निधन हो गया। इसके बाद प्रधानमंत्री पद की लड़ाई में इंदिरा गाँधी के सामने मोरारजी देसाई आ गए।
कांग्रेस संसदीय दल में हुए शक्ति परीक्षण में उन्होंने 169 के मुकाबले 355 मतों से मोरारजी देसाई को हरा दिया और इस तरह 1966 में वे देश की पाँचवीं तथा पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। जिस समय इंदिराजी ने प्रधानमंत्री पद संभाला उस समय कांग्रेस गुटबाजी की शिकार थी और मोरारजी उन्हें गूंगी गुड़िया कहकर पुकारते थे, लेकिन जल्द ही इस गूंगी गुड़िया ने सबको चौंका दिया।
1967 के चुनावों में कांग्रेस को 60 सीटों का नुकसान हुआ और 545 सीटों वाली लोकसभा में उसे 297 सीटें मिलीं। इस कारण उन्हें मोरारजी को उप प्रधानमंत्री तथा वित्तमंत्री बनाना पड़ा लेकिन 1969 में देसाई के साथ अधिक मतभेदों के चलते कांग्रेस बिखर गई। इंदिरा को समाजवादी दलों का समर्थन लेना पड़ा और अगले दो साल तक उनके समर्थन से ही सरकार चलाई।
पाकिस्तान के साथ 1971 में हुए संग्राम में उन्होंने बांग्लादेश नाम से एक नए देश के गठन में सक्रिय भूमिका निभाई जिससे वे पूरी दुनिया में दृढ़ इरादों वाली महिला के रूप में जानी जाने लगीं और अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें दुर्गा की संज्ञा दी।
अपने साहसिक फैसलों के लिए मशहूर इंदिरा गाँधी ने 1974 में पोखरण में परमाणु विस्फोट कर जहाँ चीन की सैन्य शक्ति को चुनौती दी वहीं अमेरिका जैसे देशों की नाराजगी की कोई परवाह नहीं की।
इन निर्णयों के चलते जहाँ उन्हें देश और दुनिया में बुलंद इरादों वाली महिला के रूप में तारीफ मिली वहीं 1975 में आपातकाल लगा देने के कारण इंदिरा को विश्व बिरादरी की आलोचना का भी सामना करना पड़ा।
आपातकाल लगाने की वजह से 1977 के चुनाव में उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा और वे तीन साल तक विपक्ष में रहीं। 1980 में वे फिर से प्रधानमंत्री बनीं। खालिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसा कठोर कदम उठाया, लेकिन 1984 में उनके ही अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी।
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का कहना है कि इंदिरा गाँधी भारत में बड़े पैमाने पर आतंकवाद भड़कने का अंदाज नहीं लगा पाईं। सिख उग्रवाद 1984 में स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के चलते भड़का।
उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी ने जाने-अनजाने एक ऐसे समय प्रक्रिया शुरू कर दी जब उनकी पार्टी ने भिंडराँवाला जैसे शख्स को अकालियों से लड़ाने के लिए खड़ा किया था। (भाषा)
Sunday, May 30, 2010
नक्सलवाद का विकृत चेहरा
गरीब आदिवासी किसानों की भलाई के नाम पर शुरु हुआ नक्सलवादी आंदोलन आज उन्हीं गरीब आदिवासियों के घरों के चिरागों को बुझा रहा है, बच्चों से उनकी रोटी, माँ-बाप और जीने का हक छीन रहा है। सत्ताधारी मंत्री, नेता और अफसर इस निरंकुशता को अपने स्वार्थों के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। सत्ता का एक खूनी चेहरा भी होता है जो ऊपर से दिखाई नहीं देता। नक्सलवाद भटका हुआ आंदोलन है। यह अधैर्य की उपज है। इसकी बस्ती में मानवता की कोई बयार नहीं बहती। यह पशुयुग की वापसी का उपक्रम है जिसके मूल में है हिंसा और सिर्फ हिंसा। यह जन के लुटे हुए सत्व के लिए नहीं अपितु हितनिष्ट ताकतों की राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र है, जिन्हें वस्तुतः जनता के कल्याण से कोई वास्ता नहीं है। तथाकथित समाजवादी मूल लक्ष्यों की साधना से न अब किसी कमांडर को लेना देना है न वैचारिक सूत्रधारों को । वह पथभ्रष्ट और सिरफिरे लोगों की राक्षसी प्रवृत्तियों और हिंसक गतिविधियों का दूसरा नाम है । रहे होंगे उसके अनुयायी कभी सताये हुए लोगों के देवता, अब तो उनका दामन आदिवासियों, गरीब और अहसाय लोगों के खून से रंग चुका है। उसके मेनोफेस्टो में अब दीन-दुखी, पीडित-दलित, मारे-सताये हुए पारंपरिक रूप से शोषित समाज के प्रति न हमदर्दी की इबारत है, न ही समानता मूलक मूल्यों की स्थापना और विषमतावादी प्रवृतियों की समाप्ति के लिए लेशमात्र संकल्प शेष बचा है। वह स्वयं में शोषण का भयानकतम् और नया संस्करण बन चुका है । वह अभावग्रस्त एवं सहज, सरल लोगों के मन-शोषण नहीं बल्कि तन-शोषण का भी जंगली अंधेरा है। एक मतलब में नक्सलवाद शोषितों के खिलाफ हिंसक शोषकों का नहीं दिखाई देने वाला शोषण है । कम से कम छत्तीसगढ़ के दर्पण में नक्सलवाद का तो यही विकृत चेहरा नज़र आता है। नक्सलवाद के बौद्धिक हिमायती वाग्जाल गढ़ते हैं–यह समाजवाद की क्रांतिकारी और अंतिम विधि है और मानववाद का संरक्षण ही उनका चरम ध्येय है। यदि समाजवादी आंदोलन की बुनियाद में मानव प्राण के प्रति सम्मान था तो फिर निरीह, निर्दोष लोगों को खुलेआम कत्ल करने की वैचारिक वैधता नक्सलियों ने कहाँ से ढूँढ़ निकाली। यह भी प्रकारांतर से सत्तावादी मानसिकता का परिणाम हैं। इतिहास में गवाहियाँ है कि भारतीय परंपरा में समाज के सभी वर्गों में समानता की स्थापना के लिए संचालित हर वैचारिक आंदोलन को अंततः जनता का भरपूर साथ मिलता रहा है। पर सलवा जुडूम जैसा जन आंदोलन साबित करता है कि नक्सलवाद मनुष्य का विरोधी है। जैसा कि नक्सली मानते हैं कि वे जनता के अधिकारों के पहरुए हैं और उन्हें शोषण से मुक्त करना ही उनका लक्ष्य है तो वे उसी शोषित जनता की हत्या की राजनीति क्यों चलाते हैं। यहाँ उनकी यह करतूत क्या उन्हें दक्षिणपंथी फासिज्म से नहीं जोड़ देती है? नक्सली जिस रास्ते पर चल रहे हैं उससे अंतत: लाभकारी होगा वॉर इंडस्ट्री को। खास कर उन्हें जो हथियारों की चोरी-छिपे भारत में अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति को निरंतर बनाये रखना चाहते हैं। इनकी घोर क्रांतिकारिता जैसे शब्दावली ही बकवास है। उसे मानवीय गरिमा की स्थापना की लड़ाई कहना नक्सलवाद का सबसे बड़ा झूठ है। अदृश्य किंतु सबसे बड़ा सत्य तो यही है कि वह सत्ता प्राप्ति का गैर प्रजातांत्रिक और तानाशाही (अ)वैचारिकी का हिंसक संघर्ष है । नक्सलवाद की धूर्तता के सामने समाजविज्ञानियों और विचारकों का शास्त्र भी अब पूर्णतः फेल हो चुका है जहाँ कभी यह माना जाता रहा कि नक्सलवाद की उत्पत्ति में लोकतांत्रिक सत्ता की लुच्चाई और टुच्चाई भी रही है। उनकी ओर से कभी तर्क गढ़ा जाता रहा कि देश में 92 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। मजदूरों के खिलाफ ठेकेदार,मालिक या जमींदार की तरफ से हिंसा की जाती है। जिन उत्पादक रिश्तों में हिंसा एक दैनिक कर्म हो, वहां नक्सलवाद जैसी प्रतिरोधी गतिविधियों का होना स्वाभाविक है। यह भी भूल साबित हो चुका है। और इस भूल के शिकार होकर सैकड़ों हजारों असंतुष्ट युवा, बुद्धिजीवी और बेरोजगार इस आंदोलन में अपना जीवन व्यर्थ गवाँ चुके हैं। वे भारी भूल में थे जो यह समझते रहे कि वे मानवीय हित के लिए लड़ रहे हैं या वे समाज के लिए शहीद हो रहे हैं । न उनके आँगन का अंधेरा छंटा न ही गाँव-समाज-देश का। वास्तविकता तो यही है कि जाने कितने गरीब माँओं का आँचल सूना हो चुका है। सैकड़ों असमय वैधव्य झेल रही हैं। हजारों बच्चे आज सामाजिक विस्थापन झेल रहे हैं। एक ओर उन्हें हिंसावादी की संतान मान कर असामाजिक दृष्टि को झेलना पड़ रहा है दूसरी ओर वे असमय आसराविहीन हो रहे हैं। हाँ कभी-कभी उनके पिताओं के नाम पर बने किसी स्मृति पत्थर पर जरूर दो-चार जंगली फूल जरूर सजा दिये जाते हैं। वह भी इसलिए कि भावुक और आक्रोशित युवा नक्सलियों को शहीद होने का भ्रम बना रहे। यह सिर्फ ढोंग और नक्सलवाद की कुटिल चालें हैं, और कुछ नहीं। बस्तर और सरगुजा का भी युवजन नक्सलवाद के इसी ढोंग का शिकार हो चुका है । नक्सलवाद से जुझती सरकारों की हालत भी पतली हो रही है। विकास के लिए आरक्षित धनराशि का एक बड़ा हिस्सा पुलिस और सैन्य व्यवस्था के नाम पर व्यय हो रहा है जो अनुत्पादक है। इससे तरह-तरह की नया भ्रष्ट्राचार भी पनप रहा है। यदि खबरों पर विश्वास करें तो नक्सल प्रभावित लोगों के लिए प्रायोजित राहत के नाम पर फिर से बाजारवादी और लूट-घसोट में विश्वास रखने वाले ठेकेंदारों को नई उर्जा मिल रही है । नक्सलवाद मानती है कि भारत अर्ध सामंती, अर्ध औपनिवेशिक राज व्यवस्था वाला समाज है। हथियारों के माध्यम से वे यहां पीपल्स डेमोक्रेसी यानी सर्वहारा की सत्ता स्थापित की जा सकती है। इस मुद्दे पर उग्र वामपंथी (नक्सली) और उदार वामपंथी के देखने का नजरिया भिन्न-भिन्न है। उदार वामपंथी यानी सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (माले) जैसी राजनीतिक पार्टियां संवैधानिक संस्थाओं में आस्था जताकर लोकतांत्रिक तरीके से राजसत्ता हासिल करना चाहती है जबकि इसके ठीक विपरीत नक्सली इन्हें झूठ मानते हैं। उनकी गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य है पीपल्स आर्मी गठित करना। यह एक तरह का वामपंथी सैन्यवाद है। उग्र वामपंथियों और उदार वामपंथियों के बीच विभाजन की मुख्य वजह ही है हिंसा। आखिर ये नक्सली छद्म मांग को त्यागकर लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष के लिए तैयार क्यों नहीं होते? निर्दोष लोगों की हत्या के पीछे आखिर उनका कौन-सा अदृश्य एजेंडा है? क्या यह एक नैतिक अपराध नही है? सबसे बड़ी बात है कि यह प्रजातांत्रिक मूल्यों का संपूर्ण प्रतिरोध है जिसे कतई सामाजिक मान्यता नहीं मिल सकती। आखिर बातचीत हो तो भी कैसे? अतिवादियों का यह दर्शन भी भटकाव है, मिथ्यात्मक है कि माओत्सेतुंग की मृत्यु के बाद यह सब हुआ। सच्चाई तो यही है कि माओत्से तुंग अति राष्ट्रवादी थे। माओ ने लिन प्याओ को अपना उत्तराधिकारी बनाया। वह हमेशा राज्य के हित में और कौमी राज्य के हित में संलग्न रहता था। फिर ये नक्सली किन एजेंडों पर काम कर रहे हैं और किस तरह की नैशनलिज्म की राह पर चल रहे हैं, किसी से छुपा नहीं है अब । नक्सली या माओवादी यदि खून खराबा और हिंसा त्याग दें और बाकी मांगें रखें तो ज्यादा संभव है कि उनका यह संघर्ष समाज और देश के लिए बेहतर साबित हो। लेकिन खेद है कि यह उनका लक्ष्य कम से कम अब तो वह कतई नहीं रहा। यदि ऐसा होता तो वे भी समाज की, देश की अन्य बुराईयों और दासतावादी मानसिकता के विरूद्ध लड़ते । यदि ऐसा होता तो वे न्याय व्यवस्था में सुधार, न्यूनतम मजदूरी या वेतन, मादा भ्रूण हत्या, सांप्रदायिकता, धर्मांधता और अशिक्षा के विपरीत भी एकजूट होते । यदि ऐसा होता तो ये भ्रष्ट्राचार के विरूद्ध सबसे बड़ी लड़ाई लड़ते जो आज वनांचलों की ही नहीं समूचे भारत की सबसे बड़ी समस्य़ा है । और ऐसी सभी विद्रपताओं का खात्मा समान उद्देश्यों की सूची में होती । तब कदाचित् देश का अधिसंख्यक समाज भी जो आजादी के इतनी लबीं अवधि के बाद भी बुनियादी स्वप्नों और आंकाक्षाओं को फलित होते नहीं देख सका है, उनके वैचारिक लड़ाई में साथ होता । दरअसल आत्मा से ये वामपंथी हैं और शरीर से दक्षिण पंथ । सहज ही यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि नक्सली आम आदमी के हितैषी होते तो उन लोगों को क्यों नहीं धमकाते जो आम लोगों के जो बड़े-बड़े दुश्मन है । जो राजनैतिक तंत्र में घूस कर जनता का लहू पी रहे हैं और जो सभी के शिनाख्तगी में हैं । जो खूंखार फासिस्ट हैं, जो देश में सांप्रदायिकता के खिलाफ है उन्हें सजा दिलाने में ये क्यों नहीं खड़े हुए? जाहिर है कि इनका लक्ष्य समाज की शुचिता नहीं अपितु राजनैतिक महत्वाकांक्षा ही है जो गैर प्रजातांत्रिक भी है और इस नाते किसी एक्टिविस्ट का क्रियाकलाप नहीं। नक्सलवाद विचार और चिंतन शून्य हरकत है। यह देश के बहुसंख्यक सर्वहारा जन के अमन-चैन, समृद्धि और सुख विरोधी विचारधारा है । यदि यह सच है कि इनके असली सूत्रधार वैचारिक रूप से भी समृद्ध लोग हैं तो उनकी मनीषा में यह कैसे ठूँसा जाय और वे अपनी अंतरात्मा में झांकने के लिए तैयार हों कि उनका तथाकथित समाजवादी आंदोलन तब कहां था और आज कहां है। उन्हें कौन समझाये कि आखिर ज्ञान का आधार क्या है और क्या है उसकी वैधता का मानदंड? वे यदि इस वर्तमान सिस्टम को अवैध मानते हैं और माना कि वे दिशाहीन भी नहीं है तो बंदूक की नोक पर टिकी उनकी प्रणाली परिणाममूलक होगी, इसकी क्या गारंटी है? दरअसल नक्सलियों की राजनीतिक वैधता का कोई आधार नहीं है। बंदूकधारी व्यक्तियों से क्या बातचीत होगी? लगता है कि नक्सलियों के बीच अब कोई दिलवाला नहीं रहा, बुद्धिजीवी नहीं रहा। समूचा वैचारिक फोरम ही अब मारकाट को चरम सीमा तक पहुँचाना चाहता है। नक्सलवाद को लेकर सरकारें जिस तरह राजनैतिक रोटी सेंकती रही हैं वह आम जनता की समझ से बाहर कतई नहीं है। नौकरशाह यानी वास्तविक नीति नियंताओं के बीच जनता के कितने हितैषी हैं, ऐसे चेहरों को भी आज जनता पहचानती है। उन्हें समय पर सबक सिखाना भी जानती है पर नक्सलवाद का सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि उसके परिणाम में केवल गरीब, निर्दोष, आदिवासी और कमजोर व्यक्ति ही मारा जा रहा है। इसमें राजनैतिक हत्याओं को भी नकारा नहीं जा सकता जिन्हें कई बार इनकाउंटर घोषित कर दिया जाता है। इन दिनों देश के कथित जन अधिकारवादी संगठन और प्रखर बुद्धिजीवी प्रमाणित और असंदिग्ध गिरफ्तारियों को मानव अधिकार का हनन साबित करने के लिए जिस तरह हो हल्ला मचा रहे हैं उसे या तो मानसिक रुग्णता कहा जा सकता है या फिर प्रतिभा संपन्न लोगों की विपन्नता भी, जो भाड़े में अपनी आवाज भी बेचा करते हैं । इससे प्रत्यक्षतः भले ही नक्सलियों या वाममार्गी चरमपंथियों के हौसले बुलंद नहीं होते हों पर इससे भारतीय मनीषा पर गंभीर शक तो जरूर होता है कि कहीं वे ही तो समाज और देश को फासीवाद की ओर धकेलना नहीं चाह रहे हैं? वातानुकूलित विमानों पर लादे उन्हें कौन देश भर में घुमा रहा है? आलीशान होटलों में व्हिस्की और चिकन चिल्ली की सुविधा के साथ उन्हें ठहराने वाला किस गरीब का हिमायती है और वे किसी एक व्यक्ति, जो अपनी अनैतिक और अप्रजातांत्रिक गतिविधियों से संदेहास्पद हो चुका हो, के लिए ही क्यों चिल्लपों मचा रहे हैं ? समाज और जनता को दिग्भ्रम करने का यह कौन सा बौद्धिक अनुशासन है? और जिससे शांतिप्रिय समाज के समक्ष कानून एवं व्यवस्था का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। वे कैसे यह भूलने की मूर्खता कर रहे हैं कि मानव अधिकार उनके भी हैं जो इन नक्सवादियों के क्रूरतम आक्रोश का शिकार हो रहे हैं। जो बेमौत मारे जा रहे हैं क्या उनका कोई मानव अधिकार नहीं है ? जो इन नक्सलियों के बलात्कार और लूट-घसोट के स्थायी शिकार होने को बाध्य हैं क्या उनके भी मानव अधिकार निरस्त कर दिये गये हैं ? पुलिस के निचले स्तर के जो सिपाही मारे जा रहे हैं उनके अनाथ बच्चों का कोई मानव अधिकार नहीं ? बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों के नक्सली क्षेत्र के दौरों के बहाने वन की सैर-सपाटे और शानो-शौकत में मातहत कर्मचारियों अपने छोटे-छोटे बच्चों के पेट काट कर जो चंदा दे रहे हैं उसमें मानव अधिकार हनन की कोई दुर्गंध नहीं आती ? शायद इसीलिए कि वे शासकीय वेतनधारक हैं । जो समाज से सबसे अशिक्षित और सीधे लोग अर्थात् आदिवासियों को अपने षडयंत्र का मोहरा बना रहे हैं वे कौन से मानव अधिकार की रक्षा कर रहे हैं? नक्सलियों को कौन-सा ऐसा विशिष्ट मानव अधिकार मिल गया है जो नौनिहालों को पाठशाला से जो वंचित कर रहे हैं? नक्सलवादी भूगोल की संभावित गरिमा जो छीन रहे हैं वे क्या मानव अधिकार का हनन नहीं कर रहे हैं। आखिर आदिवासी ग्रामों को सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधा से वंचित करके रखने वाले ये नक्सली कौन सा मानव अधिकार का पाठ पढ़ा रहे हैं। इसका विरोध कौन करेगा? आखिर कब बाहर निकलेंगे हमारे बुद्धिजीवी रेत से अपना सिर निकाल कर?
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